लोकगीता — यह वह गीता है जो युद्धभूमि में नहीं,
रसोई, आँगन, खेत, कार्यक्षेत्र और परिवार में प्रकट होती है।
यह एक साधारण घर को
धर्म–ध्यान–सेवा–संतुलन का आश्रम बना देती है।
यह ग्रन्थ कहता है—
> सन्तान पालन ही तप है,
अन्न पकाना ही यज्ञ है,
परिवार चलाना ही साधना है,
और गृहस्थ ही सबसे कठिन योगी है।
लोकगीता भारतीय गृहस्थ जीवन के
ध्यान, अनुशासन, प्यार, त्याग, श्रम, और सेवा को
एक सूत्र में बाँधती है:
धर्म का अर्थ — परिवार को ईश्वर रूप में मानना।
साधना का अर्थ — अपने कर्तव्यों को पूजा बना देना।
इस पुस्तक में—
गीता का गृहस्थ–रूप
18 गृहस्थ–धर्म सूत्र
आंतरिक शांति व निर्णय योग
रसोई-ध्यान और प्राणिक अन्न
परिवार-संस्कार और संतुलित जीवन
त्रिकाल स्मरण, संयम, स्वाध्याय
धन–धर्म संतुलन का मार्ग
धर्म, प्रेम, परिश्रम, परमार्थ की एकता
यह ग्रन्थ किसी संन्यासी के लिए नहीं —
उन गृहस्थों के लिए है जो जिम्मेदारियों के बीच ईश्वर को पाना चाहते हैं।
> यह पुस्तक बताती है कि मोक्ष घर से बाहर नहीं —
घर के भीतर ही चरित्र, करुणा और कर्तव्य में छिपा है।
✦ Who Should Read ✦
गृहस्थ साधक
परिवार व समाज-केंद्रित जीने वाले
भक्ति व कर्मयोगी
संस्कृति-प्रेमी युवा
आध्यात्मिक गृहिणी और माता-पिता
कर्मक्षेत्र में थके, उत्तर खोजते लोग
यह ग्रंथ जीवन को परिवर्तित करने वाला व्यवहारिक आध्यात्म प्रदान करता है।
—
✦ One-Line Essence ✦
यह पुस्तक घर को मंदिर और जीवन को साधना बना देती है।
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